हिन्दी आंदोलन के बारे में
हिन्दी की वैश्विक लोकप्रियता के आलोक में भारत सहित अन्य देशों में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार और विस्तार के लिए प्रतिबद्धता से कार्य करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत में पंजीकृत मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा एक आन्दोलन का शंखनाद किया है। इस आन्दोलन को वैश्विक रूप से हिन्दी आन्दोलन के रूप में पहचाना जाने लगा है। हिन्दी आन्दोलन का ध्येय वैश्विक रूप से हिन्दी का प्रचार-प्रसार और विस्तार है। हिन्दी के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं का विस्तार भी है। हिन्दी आन्दोलन के माध्यम से विश्व के अन्य देशों में निवासरत भारतीय समुदाय को एकीकृत करके भारतीय वैभव का प्रचार करना और हिन्दी भाषा की वैश्विक स्थापना में सहयोगी बनाना भी है।

डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष
हिन्दी आंदोलन की विविध गतिविधियाँ
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के महनीय उद्देश्य के लिए संचालित हिन्दी आंदोलन का नेतृत्व मातृभाषा उन्नयन संस्थान कर रहा है, जिसका केंद्रीय कार्यालय नई दिल्ली व अध्यक्षीय कार्यालय इंदौर, मध्यप्रदेश में स्थित है। इस आंदोलन के संस्थपक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ है। संस्थान के माध्यम से हस्ताक्षर बदलो अभियान, जन समर्थन अभियान, घर-घर पुस्तकालय, हर घर हिन्दी, शिक्षालय की ओर हिंदीग्राम जैसे कई अभियान संचालित किए जा रहे हैं।
मातृभाषा उन्नयन संस्थान के मुख्य उद्देश्य
'सात' से जोड़ो अपना 'साथ'
राष्ट्रभाषा
विश्व के सभी बड़े देशों की अपनी एक भाषा ऐसी है जो उस देश का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे ‘राष्ट्रभाषा’ कहा जाता है। भारत की कोई भी आधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है। हिन्दी भारत में 50 प्रतिशत से अधिक लोगों द्वारा बोली व समझी जाती है और इसमें वो लक्षण भी है जो राष्ट्रभाषा होने के लिए अनिवार्य है। इसीलिए संस्थान हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए प्रयासरत है।
जागरुकता
हिन्दी भाषा को लेकर दक्षिण आदि प्रान्त में भ्रम है, जागरुकता का अभाव है और खोखले हिन्दी विरोध के चलते भाषा के वर्चस्व की लड़ाई को लेकर राजनीति जारी है। ऐसे समय में संस्थान राष्ट्रव्यापी जागरुकता के माध्यम से हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार कर रही है, जागरुकता फैला रहा है। जिससे भारतीय जनमानस हिन्दी के प्रति सद्भाव रखते हुए हिन्दी से जुड़ें।
रोज़गारमूलक
किसी भी भाषा की सर्व स्वीकार्यता तभी सम्भव है, जब वह समृद्ध होने के साथ-साथ बाज़ार द्वारा भी स्वीकार की जाए। वर्तमान में भारत में हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेज़ी भी बाज़ार पर कब्ज़ा जमाने के लिए लालायित है। भारत विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है, तो इस दौर में संस्थान भारत में हिन्दी को रोज़गारमूलक भाषा बनाने के लिए भी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेगा।
न्याय की भाषा
भारत में जनता को जनता की भाषा में न्याय नहीं रहा है। अंग्रेज़ी की विधि शब्दावली अत्यधिक क्लिष्ट होने से और हिन्दी भी उर्दू मिश्रित होने से आम जनता की समझ से परे होती है। इसीलिए संस्थान 50 प्रतिशत से अधिक बोली समझी जाने वाली हिन्दी भाषा व स्थानीय भाषा में न्यायालय की कार्यवाही व जनभागीदारी की स्थापना के लिए भी प्रतिबद्ध है।
त्रिभाषा में शिक्षा व्यवस्था
भारत में पहली शिक्षा नीति बनने के साथ ही दौलतसिंह कोठारी आयोग की अनुशंसा के अनुसार देश में मिलने वाली शिक्षा में तीन भाषाओं, मातृभाषा, हिन्दी और विदेशी भाषा में अध्ययन की अनिवार्यता हो। वर्तमान शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा तो सम्मिलित हुई है। इस फॉर्मूले को लागू किया जाएँ ताकि भारतीय भाषाओं में मतभेद की स्थिति भी न रहें और इनका भी संवर्धन हो इस हेतु संस्थान प्रतिबद्ध है।
तकनीकी दक्षता
वर्तमान युग तकनीकी का है, ऐसे दौर में हिन्दी भाषा को स्थापित करने व संवर्द्धन के लिए आवश्यक अंग है इसका तकनीकी रूप से सबल होना। हिन्दी के अस्तित्व को बचाएँ रखने के लिए पूर्ण निष्ठा से संस्थान हिन्दी के रचनाकारों और उनके लेखन को संग्रहित कर प्रचार-प्रसार करेगा, जिससे हिन्दी की भव्यता चिरकाल तक स्थाई रहे तथा तकनीकी पहलुओं पर हिन्दी को सबल बनाने के लिए संस्थान प्रतिबद्ध है।
साहित्य शुचिता
भाषाई वैभव की थाह उसके समृद्ध साहित्य और परम्परा के साथ पुरखों से ज्ञात होता है। हिन्दी की गौरवशाली परम्परा तो बहुत समृद्ध है किन्तु इसे सहेज कर रखने और अपनी आगामी पीढ़ी को सौंपने का दायित्व भी मेधावी वर्तमान का होता है, इस वर्तमान की भूमिका का निर्वहन करते हुए संस्थान अपने कर्मपथ पर अग्रसर रहते हुए हिन्दी साहित्य की शुचिता का भी ख्याल रखेगा।
विचारधारा
हिन्दी आंदोलन की एकमेव विचारधारा ‘राष्ट्र प्रथम’ और भाषा हिन्दी की ही है और इसी से आंदोलन की समृद्धता भी निर्धारित होती है। इस भाव के साथ देशभर में इस विचार धारा की स्वीकार्यता भी सहज है। आज भारत का भाषाई परिचय हिन्दी से ही दिया जाता है। और भारतीयता का वैश्विक परिचय भी हमारी संस्कृति की वैभव सम्पन्नता से ही परिचय होता है।
































